Wednesday, 19 June 2019

Pooja

Ras sidhant | रस सिद्धांत

ras sidhant , bhartiya kavya shastra
ras sidhant





                                               रस सिद्धांत
                    
                    आचार्य भरतमुनि को रस संप्रदाय का मूल प्रवर्तक माना जातहै। उन्होंने अपने ग्रंथ 'नाट्यशास्त्र' में नाटक के मूल तत्वों का विवेचन करते हुए
  'रस' का विवेचन किया है | वे 'रसको नाटक का प्राण मानते हैं। 
भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में जो रस सूत्र दिया है वह निम्नलिखित है :-
   
                  "विभावानुभाव व्यभिचारी संयोगाद्रस निष्पत्ति:"

अर्थात विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भावों के (स्थायी भाव से) संयोग
से रस की निष्पत्ति होती हैं। भरतमुनि ने सर्वप्रथम  रस के स्वरूप पर विचार
किया है।  भरतमुनि के अनुसार -
                                                            रस नाटक का वह तत्व होता है              जोकि सहृदय को आस्वाद प्रदान करता है और जिसके आस्वाद 
           से वह हर्षित हो उठता है।"

डॉगणपति चंद्र गुप्त के अनुसार - 
                                                              " रस एक मिश्रित तत्व है जिसमें           स्थायी भावों के साथ भावोंअनुभावों का अभिनय मिश्रित रहता है। भावोंअनुभावों आदि से मिश्रित स्थायी भाव को जब अभिनय           के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है तो उससे समाजिक को जो                 आस्वाद प्राप्त होता हैवही रस है।"




रस सूत्र के व्याख्याता आचार्य

भरतमुनि के रस सूत्र में आए 'संयोग' एवं 'निष्पत्ति' शब्द की व्याख्या          जिन चार आचार्यों ने कीउन्हें रस सूत्र का व्याख्याता आचार्य कहा जाता है।  इन आचार्यों के नाम और इनके मत निम्नलिखित हैं:-
    
 
भट्ट लोल्लट 

रस सूत्र के प्रथम व्याख्याता आचार्य भट्ट लोल्लट हैं। इनका मत                
'उत्पत्तिवाद'  या  'आरोपवाद कहा जाता हैं। इनके अनुसार 'निष्पत्ति
का अर्थउत्पत्ति तथा 'संयोगका अर्थउत्पाद्य-उत्पादकगम्य-गमक
एवं पोष्य-पोषक सम्बन्ध। वे रस की स्थिति अनुकार्य ( मूल पात्र )में मानते 
हैं। दर्शक अभिनेताओं पर मूल पात्रों का आरोप कर लेता हैइसलिए इनका 
मत आरोपवाद कहा जाता है। 


आचार्य शंकुक

रस सूत्र के दूसरे व्याख्याता आचार्य शंकुक हैं।इनका मत 'अनुमितिवाद ' 
कहा जाता हैं। इन्होंने 'चित्रतुरंग न्यायके आधार पर रस निष्पत्ति की 
व्याख्या की। जैसे चित्र में बने तुरंग (घोड़ेको देखकर हम उसे घोड़ा मान 
लेते हैं,उसी प्रकार दर्शक नट में राम आदि की प्रतीति कर लेता है और फिर
उसमें रतिआदि भावों का भी अनुमान कर लेता है। इस विलक्षण अनुमान को 
'कला प्रतीतिकहा जाता है। शंकुक के अनुसार 'संयोगका अर्थ - अनुमान
और निष्पत्ति का अर्थ – अनुमिति



    भट्ट नायक
  
               रस सूत्र के तीसरे व्याख्याता आचार्य भट्ट नायक हैं। इनके मत को
    'भुक्तिवादकहा जाता है। रस निष्पत्ति में इनका सबसे बड़ा योगदान
    साधारणीकरण का सिद्धांत है। 
    इनके अनुसार शब्द रूप काव्य के तीन व्यापार होते हैं-
       
        अभिधा व्यापार
        
भावकत्व व्यापार
        
भोजकत्व व्यापार

    
              अभिधा से काव्य का शब्दार्थ समझ में आता है तथा भावकत्व से 
      साधारणीकरण होता है, जबकि भोजकत्व व्यापार से हम साधारणीकृत
      स्थायी भाव का रस रूप में भोग करते हैं। इनके अनुसार 'संयोग' का अर्थ 
      है- भोज्य-भोजक संबंध तथा निष्पत्ति का अर्थ- भुक्ति इनके भुक्तिवाद 
      का मूलाधार सांख्य दर्शन हैं। 


     आचार्य अभिनव गुप्त

             रस सूत्र के चौथे व्याख्याता आचार्य अभिनवगुप्त हैं। इनके मत को 
     अभिव्यक्तिवाद कहा जाता है। वे रस को व्यंजना का व्यापार मानते हैं। जैसे 
     जल के छींटे देने से मिट्टी में व्याप्त गंध व्यक्त हो जाती है, उसी प्रकार सहृदय
     में वासना रूप से निरन्तर विद्यमान स्थायी भाव विभावादि के संयोग सेअभिव्यक्त
     हो जाते हैं। वे रस की सत्ता आत्मगत मानते हैं। रस सहृदय समाजिक के हृदय
     में व्याप्त होता है। अभिनव गुप्त के अनुसार निष्पत्ति का अर्थअभिव्यक्ति 
    और संयोग का अर्थ- व्यंग्य-व्यंजक संबंध। इनका रस सिद्धांत शैव मत पर 
    आधारित है।

    रस काव्य की आत्मा

         
काव्य को पढ़ते या सुनते समय हमें जिस आनंद की अनुभूति होती है
    उसे ही रस कहा जाता है। पाठक या श्रोता के हृदय में स्थित स्थायी भाव ही
    विभावादि से संयुक्त होकर रस रूप में परिणत हो जाता हैं। काव्यानंद को
    ब्रह्मानंद सहोदर कहा गया है। रस को काव्य की आत्मा या प्राणतत्व माना
    गया है।रसहीन काव्य निर्जीव है, अत: रस के बिना काव्य का अस्तित्व ही नहीं
    है। जैसे प्राण के अभाव में शरीर व्यर्थ हैउसी प्रकार रस के अभाव में कोई 
    रचना काव्यत्व से ही रहित हो जाती है। रस ही कविता को प्राणवान बनाता है
   और वही पाठक या श्रोता को आनंदमग्न करके भाव समाधि में पहुंचा देता है। 
   अत: रस को काव्य में सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व माना जा सकता है।

     रस की विशेषताएं

    रस की अनेक विशेषताएं आचार्य विश्वनाथ में बताई हैं:-

      1. 
रस आस्वाद रूप है, इस आस्वाद्य नहीं। 

      2.
रस की उत्पत्ति सतोगुण के उद्रेक से होती है। 

      3.
रस ब्रह्मानंद सहोदर है। 

      4.
रसानुभूति अलौकिक होती है। 

      5.
रस चिन्मय (ज्ञान स्वरूप) है। 

      6.
रस स्वप्रकाशनंद है।

      7.
रस अखंड है।

      8.
रस की अनुभूति तन्मयता की स्थिति में होती है। 

      9.
रस लोकोत्तर चमत्कार है।


     रस के अवयव

     रस के चार अवयव है- स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव और संचारी भाव

   
 1. स्थायी भाव -    जो भाव हृदय में सदैव स्थायी रूप से विद्यमान रहते हैं, किन्तु
     अनुकूल कारण पाकर उदबुद्ध होते हैं, उन्हें स्थायी भाव कहा जाता है। इनकी 
     संख्या नौ मानी गई है। प्रत्येक स्थायी भाव से संबंधित एक रस होता है जिसका 
     विवरण इस प्रकार है:-

                                     रस और उनके स्थायी भाव

                                
रस का नाम              स्थायी भाव

                              
1.  श्रृंगार                       रति   
                              2.  वीर                          उत्साह
                              3. 
रौद्र                          क्रोध
                              4. 
वीभत्स                      जुगुप्सा ( घृणा)
                              5. 
अद्भुत                     विस्मय
                              6. 
शान्त                        निर्वेद
                              7. 
हास्य                        हास
                              8. 
भयानक                    भय
                              9. 
करुणा                      शोक
                           
इनके अतिरिक्त दो रसों की चर्चा ओर होती है:
                            10.
वात्सल्य                     संतान विषयक रति
                            11.
भक्ति                        भगवद् विषयक रति

           स्थायी भावों की संख्या नौ ही मानी गई है,अतः मूलतः नवरस ही माने
      गए हैं। रति के तीन भेद माने जा सकते हैंदाम्पत्य रति, वात्सल्य रति
      भक्ति सम्बंधी रति। इन तीनों से क्रमशः श्रृंगार, वात्सल्य एवं भक्ति रस
      की निष्पत्ति होती है। श्रृंगार रस को रसराज माना गया है।

   2. विभाव-   विभाव का अर्थ है- कारण। जिन कारणों से सहृदय समाजिक के 
       हृदय में स्थित स्थायी भाव उद्बुद्ध होता है उन्हें विभाव कहते हैं। विभाव दो
       प्रकार के होते हैं-
      
      आलम्बन विभावजिसके कारण आश्रय के हृदय मे स्थायी भाव उद्बुद्ध 
      होता है उसे आलंबन विभाव कहते हैं। दुष्यंत के हृदय में शकुंतला को देखकर
      'रति' नामक स्थायी भाव उद्बुद्ध हुआ तो यहां दुष्यंत आश्रय हैशकुन्तला 
      आलम्बन है।

       
उद्दीपन विभाव -  ये आलम्बन विभाव के सहायक एवं अनुवर्ती होते हैं।
       उद्दीपन के अन्तर्गत आलंबन की चेष्टाएं एवं बाह्य वातावरण दो तत्व आते हैं 
       जो स्थायी भाव को और अधिक उद्दीप्त, प्रबुद्ध एवं उत्तेजित कर देते हैं। 
       शकुन्तला की चेष्टाएं दुष्यंत के रति भाव को उद्दीप्त करेंगी तथा उपवन
       चांदनी रात, नदी का एकान्त किनारा भी इस भाव को उद्दीप्त करेंगा अत: ये 
       दोनों ही उद्दीपन है।

   3.
अनुभाव-   आश्रय की चेष्टाएं अनुभाव के अंतर्गत आती हैं, जबकि आलंबन
       की चेष्टाएं उद्दीपन के अंतर्गत मानी जाती है। अनुभव की परिभाषा देते हुए
       कहा गया है-
                                     "
अनुभावों भाव बोधक:"

       अर्थात भाव का बोध कराने वाले कारण अनुभाव के कहलाते हैं। अनुभाव 
       चार प्रकार के होते हैं-
       
कायिक या आंगिक- शरीर की चेष्टाओं से प्रकट होते हैं। 
       वाचिक- वाणी से प्रकट होते हैं।
       आहार्य- वेशभूषा, अलंकरण से प्रकट होते हैं।
       सात्विक- सत्व के योग से उत्पन्न वे चेष्टाएं जिन पर हमारा वश नहीं होता
       उन्हें सात्विक अनुभाव कहा जाता है। इनकी आठ संख्या होती है- 1. स्वेद 
       2. कम्प  3. रोमांच  4. स्तम्भ 5. स्वरभंग  6. अश्रु 7. वैवर्ण्य 8. प्रलय

  4.
संचारी भाव-    स्थायी भाव को पुष्ट करने वाले संचारी भाव कहलाते हैं। ये 
      सभी रसों में संचरण करते हैं। इन्हें व्यभिचारी भाव भी कहा जाता है। इनकी 
      संख्या 33 मानी गई है, इनके नाम-
       1.
निर्वेद        2. ग्लानि      3. शंका            4. असूया       5. मद     
       6. श्रम           7. आलस्य    8. दैन्य             9. चिंता        10. मोह     
     11. स्मृति       12. धृति       13.ब्रीड़ा(लज्जा) 14.चपलता     15.हर्ष
     16.आवेग       17.जड़ता     18.गर्व              19.विषाद      20.औत्सुक्य
     21.निद्रा         22.अपस्मार  23.स्वप्न            24.विवोध      25.अवमर्ष
     26.अवहित्था   27. उग्रता     28.मति             29.व्याधि      30.उन्माद
     31.मरण         32.त्रास        33.वितर्क


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