Monday, 24 June 2019

Pooja

Auchitya Siddhant | औचित्य सिद्धांत

auchitya siddhant ,
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                                      औचित्य सिद्धांत (संप्रदाय


                           औचित्य संप्रदाय के प्रवर्तक आचार्य क्षेमेन्द्र है।  उन्होंने अपने 
      ग्रंथ 'औचित्य विचार चर्चा ' में औचित्य को काव्य का आत्मा स्वीकार करते हुए
      कहा है कि-
                         'औचित्यं रस सिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम्'
   
      अर्थात रस से सिद्ध काव्य पर स्थिर जीवित (प्राण तत्वऔचित्य है। 
      औचित्य के बिना रस की सत्ता संभव ही नहीं है। रस को स्थिर जीवनी 
      शक्ति प्रदान करने वाला तत्व औचित्य है ,अतः वही काव्य का प्राण तत्व
     है। उनका मानना है कि गुण और अलंकार औचित्य के अभाव में चारुता
     उत्पन्न नहीं कर पाते। उनकी सार्थकता तभी है जब वे औचित्य से युक्त होते
     हैं। क्षेमेन्द्र से पूर्व भी आचार्यों ने औचित्य पर विचार किया है,परंतु उसे काव्य 
     की आत्मा के रूप में  प्रतिष्ठित करने का श्रेय आचार्य क्षेमेन्द्र को ही है। 
     भरतमुनि ने अपने ग्रंथ नाट्यशास्त्र में नायक के स्वरूपअभिनयवेशभूषा 
     आदि के लिए औचित्य की आवश्यकता पर बल दिया है। 

     
    औचित्य के भेद
  
       काव्य में औचित्य के भेद माने जाते हैं -
  
       1.   अलंकार औचित्य
       2.   
गुण औचित्य
       3.   
संगठन  औचित्य
       4.   
प्रबंध औचित्य
       5.   
रीति औचित्य
       6.   
रस औचित्य

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